SC of India: सुप्रीम कोर्ट ने 'रेवड़ी कल्चर' केस को 3 जजों की बेंच को भेजा, चुनाव में मुफ्त वादों पर रोक लगने के आसार

SC of India:  सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मुफ्त उपहार मामले को तीन न्यायाधीशों की पीठ को सौंपते हुए कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा दिए गए मुफ्त उपहार के मुद्दे पर व्यापक बहस की आवश्यकता है.

मुख्य न्यायाधीश ने कहीं ये बातें

ANI से मिली अधिकारिक जानकारी के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा कि मुफ्त उपहारों के मुद्दों की जटिलता को देखते हुए. मामला तीन-न्यायाधीशों की पीठ को भेजा जाता है.

शीर्ष अदालत (SC of India) ने मामले को तीन-न्यायाधीशों की पीठ को सौंपते हुए कहा कि इसी मुद्दे पर सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार के मामले में 2013 के फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता हो सकती है.

पीठ (SC of India) ने अपने आदेश में कहा है की,

“पार्टियों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर व्यापक सुनवाई की आवश्यकता है. कुछ प्रारंभिक सुनवाई को निर्धारित करने की आवश्यकता है. जैसे कि न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा क्या है, क्या अदालत द्वारा किसी विशेषज्ञ निकाय की नियुक्ति से कोई उद्देश्य पूरा होता है. कई पक्षों ने यह भी प्रस्तुत किया कि सुब्रमण्यम बालाजी मामले में निर्णय पर पुनर्विचार की आवश्यकता है. उक्त मामले में न्यायालय ने कहा कि इस तरह की प्रथाएं भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में नहीं आएंगी. मुद्दों की जटिलता और सुब्रमण्यम बालाजी मामले को खत्म करने की प्रार्थना को देखते हुए. हम मामलों को तीन-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजते हैं.”

शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से पूछे सवाल

शीर्ष अदालत का आदेश राजनीतिक दलों द्वारा दिए गए मुफ्त उपहारों के खिलाफ दलीलों के एक बैच पर आया है. इससे पहले, शीर्ष अदालत ने केंद्र से पूछा था कि वह चुनाव प्रचार के दौरान मुफ्त उपहार के वादे से संबंधित मुद्दों को निर्धारित करने के लिए सर्वदलीय बैठक क्यों नहीं बुला सकती है.

इस मुद्दे की जटिल प्रकृति को स्वीकार करते हुए, CJI रमना ने कहा था कि अदालत का इरादा इस मुद्दे पर एक व्यापक सार्वजनिक बहस शुरू करना था. और इसी उद्देश्य के लिए एक विशेषज्ञ निकाय के गठन पर विचार किया गया था.

पिछली सुनवाई के दौरान, शीर्ष अदालत ने कहा कि मुफ्त उपहारों से संबंधित मुद्दा जटिल है और चुनाव से पहले राजनीतिक दलों द्वारा किए गए कल्याणकारी योजनाओं और अन्य वादों के बीच अंतर करने की आवश्यकता है.

कपिल सिब्बल ने कहीं ये बातें

इस मुद्दे पर शीर्ष अदालत की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा था कि वित्त आयोग जैसा गैर-राजनीतिक निकाय इस मुद्दे को देख सकता है और सिफारिशें कर सकता है.

CJI ने यह भी कहा था कि यह राजनीतिक दलों को चुनाव प्रचार के दौरान वादे करने से नहीं रोक सकता लेकिन सवाल यह है कि सही वादे क्या हैं और जनता का पैसा खर्च करने का सही तरीका क्या है.

आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) जैसे राजनीतिक दलों ने मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की और याचिका का विरोध किया है. आप ने एक आवेदन दायर किया था जिसमें कहा गया था कि मुफ्त पानी, मुफ्त बिजली और मुफ्त परिवहन जैसे चुनावी वादे ‘मुफ्त’ नहीं हैं. लेकिन एक असमान समाज में ये योजनाएं बेहद जरूरी हैं.

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