Natural Wealth: तिब्बत की प्राकृतिक संपदा का चीन कर रहा दोहन

Natural Wealth: अधिकार समूहों के अनुसार, चीन केवल तिब्बत की प्राकृतिक संपदा के दोहन में दिलचस्पी रखता है. इन समूहों का कहना है कि चीन ने तिब्बत पर भारी नियंत्रण किया है और मौलिक अधिकारों का व्यवस्थित रूप से दमन किया है, और नागरिक समाज पर नियंत्रण कड़ा किया है. एक रिपोर्ट में ये बात सामने आई है की, तिब्बत पर कब्ज़े के बाद चीन वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों (Natural Wealth) को तेज़ी से नष्ट कर रहा है.

प्राकृतिक संसाधनों को तेज़ी से नष्ट कर रहा चीन

ANI की खबर की माने तो,चीन तेज़ी से तिब्बत के प्राकृतिक संसाधनों (Natural Wealth) को नष्ट कर रहा है. चीन द्वारा 2021 में प्रकाशित 40 पन्नों से अधिक का श्वेत पत्र लिखा है की, “1951 से तिब्बत: मुक्ति, विकास’ शीर्षक से चीन द्वारा पर्यावरणीय कारकों की उपेक्षा पर प्रकाश डाला गया है.” पेपर के फोकस में विकास, अधिक बांधों का निर्माण, और कई ढांचागत पहल शामिल हैं.

पॉलिसी रिसर्च ग्रुप का कहना है की, यह पेपर पर्यावरणीय विनाश को ध्यान में नहीं रखता है. इसके साथ ही तिब्बत में किए जा रहे विकास योजनाओं के बारे में बात करने के बावजूद, अखबार ने इसकी पारिस्थितिकी को हुए नुकसान को उजागर नहीं किया है. चीन स्वच्छ ऊर्जा से उत्पन्न बिजली की बात करते हुए कहता है, कि इसने कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम कर दिया है. लेकिन तिब्बती लोगों को इस तरह की पहल से कोई फायदा नहीं हुआ और वे रात के दौरान बिजली के बिना रहते हैं.

चीन में लाइटहाउस में जाती है सारी बिजली

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तिब्बत में लाइट देने के बजाए चीन इस लाइट का इस्तमाल अपने लाइटहाउस में कर रहा है. बता दें की, इसका उपयोग देश में मशीनों को चलाने के लिए किया जा रहा है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तीन-चरणीय योजना में असहमति को कुचलने, तिब्बत के पापीकरण और तिब्बत की किलेबंदी का आह्वान किया गया है.

ऐसा बताया जा रहा है की, तिब्बत की पारिस्थितिकी बड़े बांधों के निर्माण से प्रभावित हुई है. तिब्बत को डंप जोन बना दिया गया है. चीन द्वारा तिब्बत के पर्यावरणीय विनाश से नदियों का सूखना, ग्लेशियरों का पिघलना, पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना, बाढ़ और घास के मैदानों का नुकसान हो सकता है. बता दें की, राष्ट्रपति शी जिंगपिंग ने पिछले नवंबर में ग्लासगो में आयोजित पार्टियों के सम्मेलन (सीओपी) 26 शिखर सम्मेलन में भाग नहीं लिया, जिसका उद्देश्य पर्यावरण क्षरण के लिए एक कार्य योजना विकसित करना था.

प्रदूषणकारी देश बन रहा है चीन

एक छपे लेख में ऐसा बताया गया है की चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग के ग्लासगो में आयोजित पार्टियों के सम्मेलन में हिस्सा न लेने की वजह से उनकी बहुत आलोचना हुई है. ऐसा बताया जा रहा है की चीन में कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है और यह सबसे बड़ा प्रदूषणकारी देश है. तिब्बत से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र, मेकांग, यांग्त्ज़ी और सिंधु जैसी कई नदियाँ तिब्बत को दुनिया के महासागरों से जोड़ने वाले परिवहन का एक महत्वपूर्ण साधन होने के बावजूद प्रभावित हो रही हैं.

बता दें की, खनन गतिविधियों से क्षेत्र में प्रदूषण में वृद्धि हुई है. ल्हासा के पास की नदी, जो ल्हुंडुप काउंटी के डोलकर और ज़िबुक गांवों के लोगों की जीवन रेखा है, ग्यामा कॉपर पॉली-मेटालिक खदान से प्रदूषित हो रही है. चीन पर ये आरोप है की थ्री गोरजेस डैम “द्वारा एक जल संकट पैदा किया गया है क्योंकि यह निचले तटवर्ती क्षेत्रों में पानी के प्रवाह को बाधित करता है.”

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