India’s rice crop: जलवायु परिवर्तन भारत की चावल की फसल को इस तरह से पहुँचा रहा नुकसान

India’s rice crop: हरियाणा के बिठमारा में, राजधानी नई दिल्ली से लगभग 200 किलोमीटर (124 मील) उत्तर पश्चिम में 37 वर्षीय सतीश जांगड़ा अगस्त की शुरुआत में बेमौसम और लगातार बारिश के कारण अपनी धान (India’s rice crop) की फसल को नष्ट होते देखकर व्याकुल हैं. उन्होंने कहा की, “मैं खेती छोड़ने को मजबूर हूं. लागत उत्पादन की तुलना में बहुत अधिक है और मैं कर्ज के जाल में फंस रहा हूं.”

स्थाई  निवासी ने साझा की अपनी परेशानी

अधिकारिक मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक, स्थाई निवासी सतीश जांगड़ा हर साल अपने पड़ोसी की 3 हेक्टेयर (8 एकड़) जमीन पर खेती करता था. जिसमें वह ज्यादातर धान और अन्य अनाज जैसे गेहूं और बाजरा की खेती करता था. जिसे अब घटाकर 1 हेक्टेयर (3 एकड़) कर दिया गया है.

वह सोच रहा है कि या तो धान (India’s rice crop) के खेत को दूसरी फसल की किस्म में बदल दिया जाए या पूरी तरह से जोतना बंद कर दिया जाए ताकि उसे हर साल नुकसान की चिंता न करनी पड़े. स्थाई निवासी सतीश जांगड़ा ने मीडिया को बताया की,

“आप विभिन्न उर्वरकों, डीजल, पानी आदि पर हजारों खर्च करते हैं और जब विशेष रूप से धान के उत्पादन का समय होता है. तो आप घाटे में चले जाते हैं.” व्यापारी चावल की गुणवत्ता के अनुसार भुगतान करते हैं.  लेकिन समय के साथ किसानों का कहना है कि गुणवत्ता में कमी आई है.

आगे जांगड़ ने कहा की, “मैंने एक छोटी फर्नीचर की दुकान में काम करना शुरू कर दिया है. क्योंकि मैं सिर्फ खेती पर निर्भर नहीं रह सकता.” पूर्वी भारत के जमुई बिहार गांव में किसान राजकुमार यादव की परेशानी जांगड़ा के विपरीत है क्योंकि वह बारिश का इंतजार करते हैं ताकि उनकी धान की फसल सूख न जाए. 55 वर्षीय जांगड़ परिवार हर सुबह और शाम फसलों पर छिड़कने के लिए अपने कुएं से पानी लेता है. उनका कहना है कि उनका परिवार अब मानसून पर निर्भर नहीं रह सकता.

केवल 10 प्रतिशत फसलों की हुई है बुवाई

जांगड़ का कहना है की, “हमारे क्षेत्र में अब तक केवल 10 प्रतिशत फसलों की बुवाई हुई है क्योंकि वर्षा नहीं हुई है. हम सभी ट्यूबवेल पर निर्भर हैं. जो उच्च तापमान के कारण भी सूख रहा है.” शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में चावल का उत्पादन सूखे और भारी बारिश दोनों के कारण बाधित होता है. जिससे खेतों में पानी भर सकता है.

भारत में कुल फसल क्षेत्र का लगभग 68 प्रतिशत भाग वर्षा पर निर्भर है. भारत में चावल की कटाई वाले क्षेत्र के लगभग 40 मिलियन हेक्टेयर (100 मिलियन एकड़) में से 60 प्रतिशत सिंचित है और शेष वर्षा पर निर्भर है. और इसलिए सूखे के लिए अतिसंवेदनशील है.

एक गैर-लाभकारी अनुसंधान संगठन, अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (IWMI) की प्रमुख शोधकर्ता अदिति मुखर्जी ने कहा कि कुल मिलाकर  जलवायु परिवर्तन ने चरम घटनाओं की संभावना को बढ़ा दिया है.

प्रमुख शोधकर्ता अदिति मुखर्जी ने कहा की, “सिंचाई तक पहुंच के माध्यम से सूखे के प्रभाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है. भारत के कुछ हिस्सों जैसे पूर्वी भारत जो एक प्रमुख चावल की टोकरी है. उसके पास पर्याप्त सस्ती सिंचाई नहीं है और ज्यादातर महंगे डीजल पंपों पर निर्भर हैं.”

इस साल उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों में धान की बुवाई प्रभावित हुई है. जिसके परिणामस्वरूप धान के रकबे में 13 प्रतिशत की कमी आई है.

किसानों के लिए ये साल है कठिन

IWMI के अदिति मुखर्जी ने मीडिया को बताया कि यह किसानों के लिए एक कठिन वर्ष होने जा रहा है. उन्होंने कहा की, “गर्मी की लहरों के बाद मानसून के देर से आने के कारण सूखे जैसी स्थितियों ने दो मुख्य फसलों, पिछले सीजन में गेहूं और अब चावल को प्रभावित किया है.”

उन्होंने आगे कहा कि धान की इतनी देर से बुवाई से उपज प्रभावित होने की संभावना है. और अगले फसल चक्र में भी देरी करता है. संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि विभाग ने अनुमान लगाया है कि चावल का उत्पादन 0.9 प्रतिशत तक कम हो सकता है. 2015 के बाद पहली गिरावट आई है.

इससे विशेषज्ञों को पता चलता है उनका कहना है कि उन्हें स्थिति पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है. खासकर अगर सरकार गेहूं के लिए मई में इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगाने या सीमित करने का फैसला करती है.

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