Fake Encounters: बलोच मानवाधिकार कमेटी ने पाकिस्तान में फर्जी मुठभेड़ों में लापता लोगों की हत्या की निंदा की

बलोच समर्थक अधिकार समिति ने उत्तरी  के जियारत जिले में कथित तौर पर फर्जी मुठभेड़ों में लापता लोगों के मारे जाने (Fake Encounters) की निंदा की है.

बता दें की, बलोच यक्जेहटी कमेटी-कराची (Baloch Yakjehti Committee) ने इस कृत्य की निंदा करते हुए अपना दुख व्यक्त किया है. उन्होंने उर्दू (Urdu) में ट्वीट करके इस बात को साझा किया है.

ट्वीट में कहीं ये बातें

बलोच यक्जेहटी कमेटी-कराची (Baloch Yakjehti Committee) ने ट्वीट करके कहा है की,

“जबरन गायब होना अपने आप में एक अपराध है. और एक लापता व्यक्ति को आतंकवादी के रूप में झूठा मामला बनाकर मौत के घाट (Fake Encounters) उतारना एक अपराध है. और साथ ही मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है. जो निंदनीय नहीं हो सकता है. बलूच यकजेहटी समिति (karachi) भी बीवाईसी (BYC) द्वारा आयोजित ट्विटर अभियान का समर्थन करती है. हम प्रत्येक व्यक्ति से बलूच लापता व्यक्तियों के फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ आवाज उठाने का आग्रह करते हैं. यह रणनीति बलूच नरसंहार का एक रूप है और हम इसकी कड़ी निंदा करते हैं.”

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, निर्दोष बलूच फर्जी मुठभेड़ों में मारे जा रहे हैं. इतना ही नहीं बल्कि उनके शव भी चितिर-बितिर पड़े हुए हैं. ऐसा बताया जा रहा है, हाल ही में जियारत (Ziarat) में फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए नौ लोगों को पहले जबरदस्ती गायब कराया गया है. ये मामला तब शुरू हुआ जब पाकिस्तानी सेना की मीडिया विंग ने कुछ दिन पहले कहा था कि देश की सेना ने एक सैन्य अभियान में पांच आतंकवादियों को मार गिराया है.

सेना पर सवाल उठाने वाले हो जाते हैं आतंकी

ANI की ख़बर के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना के मीडिया विंग आईएसपीआर (ISPR) ने बयान में कहा, “शेष अपराधियों को पकड़ने और अपहरणकर्ता को पकड़ने के लिए इलाके में सफाई अभियान जारी रहेगा.” ये उन लोगों के लिए कहा गया है जो गायब हुए हैं. और पाकिस्तानी (Pakistan) सेना ने उनको आतंकवादी करार दे दिया है.

इससे पहले, पाकिस्तानी सेना ने 25 जून को उत्तरी वजीरिस्तान में एक खुफिया-आधारित ऑपरेशन (IBO) के दौरान चार आतंकवादियों को मार गिराया था.

ऐसा  बताया जा रहा है की, पाकिस्तानी सेना जबरन उन लोगों को आतंकी घोषित कर देती है जो लोग देश की सर्वशक्तिमान सेना की स्थापना पर सवाल उठाते हैं या व्यक्तिगत या सामाजिक अधिकारों की तलाश करते हैं. एक रिपोर्ट में ऐसा दावा किया गया है की, यह एक ऐसा अपराध है जिसका इस्तेमाल अक्सर अधिकारियों द्वारा बिना किसी गिरफ्तारी वारंट, आरोप या अभियोजन के उपद्रव माने जाने वाले लोगों से छुटकारा पाने के लिए किया जाता है.

ज्यादातर इन अपहरणों के शिकार में अक्सर युवा, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग शामिल होते हैं. बलूच  संगठन का कहना है कि अधिकारी पीड़ितों को सड़कों या उनके घरों से पकड़ लेते हैं और बाद में यह बताने से इनकार करते हैं कि वे कहां हैं. बलूचिस्तान में 2000 के दशक की शुरुआत से जबरदस्ती अपहरण किए जा रहे हैं. छात्र अक्सर इन अपहरणों का सबसे अधिक लक्षित वर्ग होते हैं. जानकारी के मुताबिक, पीड़ितों में कई राजनीतिक कार्यकर्ता, पत्रकार, शिक्षक, डॉक्टर, कवि और वकील भी शामिल हैं.

 

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